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SWARAJYA AN EXPOSITION

 SWARAJYA is not a hypothetical utopia,a illusionary concept,a quixotic spanish castle but it is the expression of avision in action of a innate burning desire to serve the nation as abounden service and duty for the nation as a born national and as motherland as a son of the land this is not a  common trait present or known to all only a fortunate few have this living spark engrained in their person had it been so we would have had many shivajis,maharana prataps etc. whenever the nation was imperilled divine ordained warrior sons who had that inborn zeal to protect the self respect of the motherland spurred into action they never waited for a call or muster a army but led a a offensive action t0 defend the nation SWARAJYA or self rule as autonomous sovereign entity was a concept of nursed by few warrior visionaries like  maharana pratap,chatrapati shivaji and the kshatriya tradition from rana kumbha to rana raj singh which spurred by the zeal to serve the nation got into...
 यतो धर्मस्ततो जय: धर्माचार्य अर्थात सनातन धर्म में जगद्गुरु शंकराचार्य का आदेश अनुशासन ही सर्वोपरि एवं सर्वमान्य है ईसाई पोप के आदेश, इस्लाम इमाम के आदेश पर चलता है भारत को एक सूत्र में एक आस्था एक दर्शन एक विचार क्रांति में बांधने का कार्य आदि शंकराचार्य ने किया राष्ट्र एक राष्ट्र भाव से ही बांधा जा सकता है भारत की चैतन्य शक्ति हमारी आध्यात्मिक चेतना परंपरा रही है जिसका पोषण हमारे आध्यात्मिक आचार्य प्रवरों ने ही किया आचार्य चाणक्य भी एक आध्यात्मिक आचार्य थे जिन्होंने भारत को एक सूत्र में बांध परकीय आक्रांता के विरुद्ध एक राष्ट्र एक भाव अखंड भारत को एक प्रतिरोध प्रतिकार के लिए खड़ा कर सम्राट चन्द्रगुप्त का चयन कर अलक्षेन्द्र के आक्रमण को विफल कर एक अखंड भारत साम्राज्य को जन्म दिया भारत जब भी विषम परिस्थितियों में फंसा भारत ने अपने किसी न किसी पुत्र पुत्री को अपने स्व की रक्षा हेतु खड़ा किया है मुस्लिम आक्रांताओं के विरुद्ध भी एक वीर परंपरा बप्पा रावल महाराणा प्रताप छत्रपति शिवाजी छत्रपति शंभूराजे आदि अनेक ज्ञात अज्ञात वीरों को खड़ा करती रही जिन्होंने मातृभूमि के स्व की रक्षा हेतु ...
 हम सनातनी ही रहे कब बंटे प्रसिद्ध इतिहासकार, विदेशी यात्रियों ने भी मेगेस्थिनीज के इंडिका से ले कर इतिहास यात्रा के विभिन्न काल खंडों में भी हमें एक माना है कार्यानुसार वर्गों को विभाजन नहीं कहा जा सकता हमारा शरीर है इस शरीर के विभिन्न अंग हैं हाथ, पांव आदि हर अंग का शरीर के सुचारु संचालन में विशिष्ट भूमिका है हाथ का काम हाथ ही कर सकता है,पैर का पैर ही हाथ से हम काम कर सकते हैं और पैरों से चल सकते हैं लेकिन इस आधार पर इन अंगों को हम शरीर का ही अंगभूत घटक मानते हैं न कि पृथक वैसे ही ऋग्वेद के पुरुष सूक्त के अनुसार विराट पुरुष की संकल्पना में ब्राह्मण मुख, क्षत्रिय बाहु,वैश्य उरु एवं क्षुद्र पांव कहा गया और इन्हें वर्ण व्यवस्था कहा गया, श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने भी कहा मैंने चार वर्णों का सृजन किया है गुण एवं कर्म के अनुसार समाज के सांगोपांग विकास एवं संचालन के लिए शिक्षा,शासन प्रशासन सुरक्षा,अन्नोत्पादन, व्यापार, पशु पालन एवं सेवा की आवश्यकता होती है एक राष्ट्र को जागृत, ज्ञान और विज्ञान से चैतन्य रख समाज के हर वर्ग को राष्ट्रीय चरित्र से ओतप्रोत करने के लिए ब्राह्मण...

अखंड भारत~ सुरक्षित,समर्थ,संप्रभु सांस्कृतिक राष्ट्र

समर्थ भारत ही सुरक्षित भारत हो सकता है अन्यथा कदापि नहीं प्राकृतिक रूप से देवनिर्मित भारत भूमि यथा उत्तरं यत समुद्रस्य हिमाद्रशचैव दक्षिणम वर्षं तद भारतम नाम भारती यात्रा संततिः एवं आसिन्धु सिंधु पर्यंत यस्य भारत भूमिका मातृभू से तात्पर्य है भारत की सीमाओं से अर्थात राष्ट्रीय सीमा भारत की सांस्कृतिक सीमा का निर्धारण सहज नहीं है क्यूंकी पूरे दृश्यमान जगत मे वह फैली थी विश्व मे अनेकों देशों मे भारतीय संस्कृति अथवा सनातन संस्कृति के पदचिन्ह प्राप्त होते हैं यह सिद्ध करता है की सम्पूर्ण विश्व मे इसका विस्तार था उत्खनन मे शिव लिंग एवं योनि अर्थात शिव शक्ति के प्रतीक प्राप्त होते हैं इससे सिद्ध होता है की सम्पूर्ण विश्व में शिव अर्थात पुरुष शक्ति एवं शक्ति अर्थात स्त्री शक्ति की पूजन परंपरा प्रचलन मे थी विश्व के सभी सभ्यताओं मे देव देवी परंपरा प्राप्त होती है यूनान मिस्र रोमन सभी मे यह पाया जाता रहा है देवोत्पत्ति के सिद्धांत प्रायः एक जैसे ही हैं दैवी एवं आसुरी शक्तियों का संघर्ष सत्य की असत्य अधर्म पर विजय ही धर्म का आधार रहा है अधर्म का प्राबल्य एवं दैवी शक्तियों का पुंजीभूत हो अवतार अथव...