हम सनातनी ही रहे कब बंटे प्रसिद्ध इतिहासकार, विदेशी यात्रियों ने भी मेगेस्थिनीज के इंडिका से ले कर इतिहास यात्रा के विभिन्न काल खंडों में भी हमें एक माना है कार्यानुसार वर्गों को विभाजन नहीं कहा जा सकता हमारा शरीर है इस शरीर के विभिन्न अंग हैं हाथ, पांव आदि हर अंग का शरीर के सुचारु संचालन में विशिष्ट भूमिका है हाथ का काम हाथ ही कर सकता है,पैर का पैर ही हाथ से हम काम कर सकते हैं और पैरों से चल सकते हैं लेकिन इस आधार पर इन अंगों को हम शरीर का ही अंगभूत घटक मानते हैं न कि पृथक वैसे ही ऋग्वेद के पुरुष सूक्त के अनुसार विराट पुरुष की संकल्पना में ब्राह्मण मुख, क्षत्रिय बाहु,वैश्य उरु एवं क्षुद्र पांव कहा गया और इन्हें वर्ण व्यवस्था कहा गया, श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने भी कहा मैंने चार वर्णों का सृजन किया है गुण एवं कर्म के अनुसार समाज के सांगोपांग विकास एवं संचालन के लिए शिक्षा,शासन प्रशासन सुरक्षा,अन्नोत्पादन, व्यापार, पशु पालन एवं सेवा की आवश्यकता होती है एक राष्ट्र को जागृत, ज्ञान और विज्ञान से चैतन्य रख समाज के हर वर्ग को राष्ट्रीय चरित्र से ओतप्रोत करने के लिए ब्राह्मण वर्ग को शिक्षा, संस्कृति, संस्कार का पीढ़ियों को जोड़ने काम संस्कृति एवं संस्कार का पीढ़ियों से एक नैष्ठिक परंपरा का रूप देने का कार्य गुरुकुल पद्धति से संचालित होता रहा गुरुकुल में अध्ययन के चालीस क्षेत्र थे और आज आधुनिक युग में प्रचलित प्रायः सभी ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र आ जाते हैं क्योंकि ज्ञान विज्ञान का स्रोत हमारे ऋषि मुनियों द्वारा प्रतिपादित वैदिक ज्ञान विज्ञान जो चतुर्वेद यथा ऋग्,यजुस्,साम एवं अथर्ववेद में सन्निहित है वेद शब्द की व्युत्पत्ति विद् धातु से होती है अतः आज भी हम विद्वान,विदुषी आदि शब्द व्यवहार में लाते हैं प्रचलित ब्राह्मण शब्द उस वैदिक ब्राह्मण सा नहीं रह गया है आज हमने ब्राह्मण की पहचान पूजा अनुष्ठान करवाने वाले पंडित जी के रूप में कर दी है ब्राह्मण वह था जो ब्रह्म को जान चुका हो, त्रिकाल संध्या और गायत्री का उपासक हो यह ब्राह्मण के कर्म थे और जो भी वर्ण धर्म का अनुपालन करे वह उस वर्ण का अधिकारी है जन्मना जायते शूद्रा संस्काराद्द्विजुच्यते से भान होता है कि जन्म से सभी क्षुद्र हैं संस्कार से वे द्विज होते हैं अर्थात यज्ञोपवीत संस्कार से वेदारंभ से हमारा दूसरा जन्म होता है प्रथम मां के गर्भ से महाभारत के शांति पर्व में शूद्रोपि शील संपन्नौ गुणवान ब्राह्मणो भवेत् ब्राह्मणेन क्रिया हीन: शूद्रात्प्रत्यवरो भवेत् से तात्पर्य है कि यह कोई आवश्यक नहीं था कि जो ब्राह्मण है वह ब्राह्मण ही रहेगा वह तभी तक ब्राह्मण है जब तक वह ब्राह्मण धर्म कर्म का निर्वहन करता है एक शूद्र भी ब्राह्मणत्व प्राप्त कर सकता है यथा महर्षि वेदव्यास,सूत जी आदि क्रमश:

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