सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एक विश्लेषण

 सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भारत राष्ट्र की मौलिक अवधारणा है सांस्कृतिक से  संस्कारजन्य से अभिप्राय है संस्कार वैदिक पृथ्वी सूक्त के माता  भूमि: पुत्रोहं पृथवया से है जो हमारा मातृभूमि से मत पुत्र का संबंध स्थापित करता है जो एक नैसर्गिक सत्य है मत एवं पुत्र का संबंध पवित्रताम एवं दैवीय है पारंपरिक स्थापना से निष्ठा का जन्म होता है मत पुत्र संबंध के चलते हम मातृभूमि कहते हैं सम्पूर्ण विश्व मे हम ही अकेले मातृभूमि कहते हैं राष्ट्र औरों के लिए एक भूमि का टुकड़ा अथवा एक भौगोलिक पहचान होगी हम हमारे वैदिक ऋषि पूर्वजों के पाठ पर चल भारत को जीवंत राष्ट्र देव मानते आए हैं यह एक स्थापित सत्य है  अतः निष्ठा एक मौलिक आधार है जो हमे राष्ट्र भाव से ओतप्रोत करता है भारत के वैदिक मूल की सजीवनी हमारे ऋषि पूर्वजों द्वारा प्रदत्त सत्य सनातन वैदिक धर्म है सर्वं खलविदं  ब्रह्म के ओजस्वी विचारधारा से  विश्व को ब्रह्म का रूप जान नदियों,पर्वतों,वनस्पतियों,प्रकृति की हम पूजा करते हैं एकां सद विप्र बहुधा वदंति के अनुसार हम सर्व धर्म समभाव मे विश्वास रखते हैं एक परमेश्वर को विभिन्न दृष्टिकोण से देखने  को हम पंथ कहते सूर्य का प्रतिबिंब विभिन्न जल स्रोतों जैसे नदी इत्यादि में पृथक दिखलाई देने से वह अनेक नहीं हो जाता अपितु एक ही राहत है अतः सभी पंथों का परम उद्देश्य ऊर्धवोत्थान ही है ईश्वर प्राप्ति के अपने पंथ के मार्ग दर्शन से प्रचलित  मार्ग का अनुसरण कर धर्म एक ही है सत्य सनातन वैदिक ऋषि परंपरा प्रदत्त वैदिक सनातन धर्म   धर्म की वैज्ञानिक सांगोपांग परिभाषा केवल संयान मनीष ने दी है धृति क्षमा दमोस्तेयं शौचम् इन्द्रियनिग्रह धी विद्या सत्यम अकरोधों धर्मं दश लक्षणं वर्णित दश लक्षण युक्त धर्म ही सत्य अर्थ मे धर्म है विश्व कल्याण सर्व अभ्युदय सर्वे भवन्तु सुखिनः ,वसुधिव कुटुंबकाम,बहु जन हित्यय बहु जन सुखाय की बात सनातनी भारतीय ही रखता एवं करता है ऐसे पवन सनातन धर्म के वाढ वृक्ष की छाया मे ही युद्ध,अशान्ति,संहार भरे विश्व को आश्रय मिलन तय है महर्षि वेद व्यास के शब्द ऊर्ध्व भाव विरौम्येश न च किंचित श्रनोति मे धर्मदार्थश्च कमश्च स धर्मः किम न सेव्यते अतः वैदिक राष्ट्र निष्ठा एवं वैदिक सनातन धर्म की आस्था से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की संकल्पना की स्थापना होती है यह एक परिभाषित स्वयंसिद्धह अकाट्य सत्य है हामारी संस्कृति भारत को राष्ट्र देव के पद पर वैदिक निष्ठा पर स्थापित करती है एवं वैदिक आधार पर भूमि माता के रूप मे माँ भारती के रूप मे स्थापित भी करती है स्वातंत्र्य समर मे प्रथम स्वातंत्र्य आंदोलन सन्यासी विद्रोह जिसे ऋषि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपनी अमर कृति आनंद मठ मे गौरवान्वित किया के हमारे राष्ट्र गीत वनडे मातरम से ले कर महाकवि जय शंकर प्रसाद के अरुण वह मधुमय देश मेरा से द्रविड कवि सुब्रमण्यम भारती से ले कर स्वातंत्र्य समर के हुतात्माओं एवं महर्षि अरविंद,स्वामी विवेकानंद,आदि शंकराचार्य,लोकमान्य तिलक,विनायक दामोदर सावरकर आदि असंख्य ने भारत को परकीय दासत्व से मुक्ति के लिए भारत को एक भूमि  नहीं माने अपितु मातृभूमि और उससे आगे बढ़ माँ भारती माना और माँ दिया महाराणा प्रताप,छत्रपति शिवाजी,रानी लक्ष्मीबाई आदि ने भी इसी पाठ का अनुसरण किया अतः भारत मत की अवधारणा,संकल्पना मौलिक,वैदिक एवं सनातन है अतः सिद्धतः सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जिसका आधार आस्था एवं निष्ठा है ही एकमेव मरग है जिस से हम भारत मे राष्ट्र भाव एवं पारंपरिक सनातन प्रचलित आस्था एवं सद्भाव सहित निवास करते आॅ रहे हम सभी भारतीय ही हैं परंतु अपेक्षा राष्ट्र भाव,राष्ट्र निष्ठा एवं आस्था की अवश्य है एवं सदैव ही रहेगी जन्म से कोई भी राष्ट्रीय नहीं हो जाता राष्ट्र भाव,राष्ट्र निष्ठा,राष्ट्र के प्रति आस्था किसी को भी सच्चे अर्थों मे राष्ट्रीय बनती है                वँदे   मातरम    

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