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Showing posts from July, 2025

Necessity of Bharat as Vishwaguru

 turn of events globally show a unending period of escalation of tension all over the world over triggered breakup of then USSR into CIS fall of a once super power key to the balance of power shared by two major players US & USSR balanced by the parity of NATO & Warsaw Pact but after the end of the Cold War USSR disbanded Warsaw Pact but never did the US this shows a clear motive of having the upper hand in world affairs as global cop or the global ombudsman or both rolled in one for monopoly over the global affairs after the weakening of the USSR now the situation is that the SSSR/USSR/CIS is a chapter closed and forgotten now RUSSIA under Putin has emerged to reclaim the glory and the position which it lost this seems irksome for AMERICA under Trump America was having its way till now but now it's facing a challenge from Russia reemerging as a major rival and stakeholder in the race for supremacy over the world the ensuing wars in the middle east and Russia Ukraine have m...

Time to set historical wrongs right~Be Bharat

 No sovereign independent Nation can bear the burden of historical wrongs imposed upon it we are a nation whose future was decides overseas by a imperial power which reigned over the world moreover whose sun never set undoubtedly we were a colony of the British then Government of India Act 1935 & Independence Of India Act 1947 adopted and passed by the british parliament decided our future a ancient undivided Akhand Bharat with a illustrious antiquity preserved and protected by our valiant forefathers was partitioned falling prey to selfish political gamesters puppeted by the imperial power of the british ever reluctant to take off their hands off the 'jewel in the crown' i.e. India a name imposed by the british removing the ancient name Bharat or the Illumined or the Land of Emperor Bharat after whom Our Motherland derives it's name as is well known the British prime minister Sir Winston Churchill had said I will not be the first & the last prime minister to presid...

नमोस्तुते भगवद्धवजाय~औत्सविक मनोगत

 गुरु पूर्णिमा पर हम अपने गुरु भगवद्धवज का पूजन-अर्चन करते हैं संघ ने भगवा ध्वज को गुरु के रूप में स्वीकार किया व्यक्ति का पतन सम्भव है परन्तु तत्व का पतन नहीं हो सकता अतः भगवा ध्वज का केसरिया रंग जो त्याग, समर्पण,तप, बलिदान एवं शौर्य का प्रतीक है उसे हमने गुरु स्थान दिया ज्ञात हो कि हमारा राष्ट्रीय ध्वज भगवा ध्वज ही स्वीकार किया गया था और पं नेहरू ने भी स्वीकार किया था परन्तु वह बात नहीं बन सकी उसके बाद भी वर्तमान राष्ट्रीय ध्वज में केसरिया रंग सबसे ऊपर रखा गया है भगवा ध्वज अथवा भगवद्धवज सदैव से भारत का स्वीकृत प्रचलित ध्वज रहा है अर्जुन के रथ पर भी केसरिया ध्वज ही था राजपुताना में केसरिया रंग ही लोकप्रिय है और गर्व से धारण , प्रदर्शित करने का प्रचलन है यज्ञ कुंड से निकलने वाली अग्नि शिखा का रंग भी भगवा ही होता है सूर्यास्त के समय सूर्य का रंग भी भगवा होता है क्षत्रिय धर्म का निर्वहन करने हमारे क्षत्रिय वीर केसरिया बाना धारण करते थे त्याग समर्पण और बलिदान का रंग भगवा ही है और यह भगवा रंग हमें अगणित,अनुकृत,अगेय वीरों, वीरांगनाओं के त्याग, समर्पण और बलिदान का स्मरण कराता है और हमें ...

वैविध्य में एक्य~ भारत का वैशिष्ट्य

 आज यह दुर्भाग्य है कि महाराष्ट्र छत्रपति शिवाजी शंम्भा जी जैसे धर्म रक्षक हिंदुत्व के पुरोधाओं की भूमि पर सत्ता प्राप्त करने के लिए भाषा विवाद खड़ा करने की कोशिश ठाकरे बंधुओं के द्वारा अपने अस्तित्व को बचाने के लिए किया जा रहा है बाला साहब ठाकरे ने भी राजनीतिक शुरुआत मराठा मानुष के मुद्दे से की थी पर उस छवि से वे क्षेत्रीय नेता ही बन सके जब उन्होंने हिंदुत्व को अपनाया वे अखिल भारतीय स्तर पर हिंदुत्व के फायर ब्रांड बन सके थे छत्रपति शिवाजी का , पेशवा बाजीराव प्रथम, शंम्भा जी आदि सभी का लक्ष्य छत्रपति शिवाजी का हिंदवी स्वराज्य ही रहा कृष्णा नदी से अटक वह मराठा स्वप्न नहीं था अपितु छत्रपति शिवाजी का भारत का स्वप्न था, रायगढ़ में ली हिंदु राष्ट्र अखंड भारत की शपथ थी प्रथमत: परकीय शासन जो लगभग भारत पर स्थापित हो चला था उसके विरुद्ध सह्याद्रि का सिंह छत्रपति शिवाजी ने हिंदुत्व का जयघोष एवं हिंदवी स्वराज्य का बीड़ा उठाया और जीवन में निभाया छत्रपति शिवाजी की राज मुद्रा 'प्रतिपच्चंद्र रेखैव वर्धिष्णुर्वंदिता शाह सूनो शिवस्यैषा मुद्रा भद्राय राजते' संस्कृत में, रायगढ़ में १६७४ में भव्य...
 भारत एक पंथ निरपेक्ष राष्ट्र रहा है न कि धर्म निरपेक्ष धर्म केवल वही है जो एक सांगोपांग परिभाषा दे सकते हैं हमारे मनीषियों ने न केवल एक सांगोपांग परिभाषा दी अपितु शब्द व्युत्पत्ति से धर्म का विश्लेषण किया संस्कृत के धृ धातु से धर्म शब्द की उत्पत्ति हुई है धृ का अर्थ धारण है और एक श्लोक धृति क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रह: धी: विद्या सत्यमक्रोधो दशकम धर्म लक्षणं यह बताने के लिए पर्याप्त है कि हम सनातन धर्मी सिद्धांतत: एक परिभाषा एवं शब्दव्युत्पत्ति के आधार पर सनातन धर्म / वैदिक धर्म/श्रीमद्भगवद्गीता का मानव धर्म ही सत्यार्थ में धर्म है अन्य सभी प्रचलित पूजा पद्धतियों को पंथ कहा जाना उचित होगा सभी पंथ के प्रवर्तक ज्ञात हैं सनातन धर्म कालप्रवर्तित एकमेव ऐसी विचारधारा, आध्यात्मिक, दार्शनिक सनातन विचार परंपरा है जिसके आदि अंत का पता नहीं है वैदिक ज्ञान परंपरा में ऋत् को प्रकृति का आदि धर्म है जिससे ही ऋतु शब्द की व्युत्पत्ति है वैदिक दृष्टाओं, गुरु-शिष्य परंपरा से एक पारंपरिक विचार-आचार की परिपाटी स्थापित हुई जिसे हमने सनातन धार्मिक जीवन पद्धति अथवा वैदिक संस्कृति जीवन पद्धति को ...

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एक विश्लेषण

 सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भारत राष्ट्र की मौलिक अवधारणा है सांस्कृतिक से  संस्कारजन्य से अभिप्राय है संस्कार वैदिक पृथ्वी सूक्त के माता  भूमि: पुत्रोहं पृथवया से है जो हमारा मातृभूमि से मत पुत्र का संबंध स्थापित करता है जो एक नैसर्गिक सत्य है मत एवं पुत्र का संबंध पवित्रताम एवं दैवीय है पारंपरिक स्थापना से निष्ठा का जन्म होता है मत पुत्र संबंध के चलते हम मातृभूमि कहते हैं सम्पूर्ण विश्व मे हम ही अकेले मातृभूमि कहते हैं राष्ट्र औरों के लिए एक भूमि का टुकड़ा अथवा एक भौगोलिक पहचान होगी हम हमारे वैदिक ऋषि पूर्वजों के पाठ पर चल भारत को जीवंत राष्ट्र देव मानते आए हैं यह एक स्थापित सत्य है  अतः निष्ठा एक मौलिक आधार है जो हमे राष्ट्र भाव से ओतप्रोत करता है भारत के वैदिक मूल की सजीवनी हमारे ऋषि पूर्वजों द्वारा प्रदत्त सत्य सनातन वैदिक धर्म है सर्वं खलविदं  ब्रह्म के ओजस्वी विचारधारा से  विश्व को ब्रह्म का रूप जान नदियों,पर्वतों,वनस्पतियों,प्रकृति की हम पूजा करते हैं एकां सद विप्र बहुधा वदंति के अनुसार हम सर्व धर्म समभाव मे विश्वास रखते हैं एक परमेश्वर को विभिन्न दृष्टिक...