भारत एक पंथ निरपेक्ष राष्ट्र रहा है न कि धर्म निरपेक्ष धर्म केवल वही है जो एक सांगोपांग परिभाषा दे सकते हैं हमारे मनीषियों ने न केवल एक सांगोपांग परिभाषा दी अपितु शब्द व्युत्पत्ति से धर्म का विश्लेषण किया संस्कृत के धृ धातु से धर्म शब्द की उत्पत्ति हुई है धृ का अर्थ धारण है और एक श्लोक धृति क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रह: धी: विद्या सत्यमक्रोधो दशकम धर्म लक्षणं यह बताने के लिए पर्याप्त है कि हम सनातन धर्मी सिद्धांतत: एक परिभाषा एवं शब्दव्युत्पत्ति के आधार पर सनातन धर्म / वैदिक धर्म/श्रीमद्भगवद्गीता का मानव धर्म ही सत्यार्थ में धर्म है अन्य सभी प्रचलित पूजा पद्धतियों को पंथ कहा जाना उचित होगा सभी पंथ के प्रवर्तक ज्ञात हैं सनातन धर्म कालप्रवर्तित एकमेव ऐसी विचारधारा, आध्यात्मिक, दार्शनिक सनातन विचार परंपरा है जिसके आदि अंत का पता नहीं है वैदिक ज्ञान परंपरा में ऋत् को प्रकृति का आदि धर्म है जिससे ही ऋतु शब्द की व्युत्पत्ति है वैदिक दृष्टाओं, गुरु-शिष्य परंपरा से एक पारंपरिक विचार-आचार की परिपाटी स्थापित हुई जिसे हमने सनातन धार्मिक जीवन पद्धति अथवा वैदिक संस्कृति जीवन पद्धति को सनातन वैदिक संस्कृति समझा,माना एवं कार्य-संस्कृति मान परंपरा के रूप में अंगीकृत किया एवं आगामी पीढ़ी को संस्कारित, प्रेरित करने की भी एक रोड मैप तैयार हो सका है यह हमारे वैदिक ऋषि परम्परा की दूरदर्शिता थी कि आज एक अनमोल धरोहर हमें प्राप्त है धर्मनिरपेक्ष के स्थान पर पंथ निरपेक्ष शब्द का प्रयोग करना उचित होगा और तो और मूल भारतीय संविधान में 'संप्रभु लोकतांत्रिक गणतंत्र' था आपातकाल में इंदिरा गांधी ने संविधान के ४२वें संशोधन में संविधान की प्रस्तावना जो संविधान का अंत:करण में परिवर्तन कर बलात् 'धर्म निरपेक्ष' एवं 'समाजवाद' शब्द जोड़े गये ये बाहर से डाले गये हैं और मूल भारतीय संविधान का अंग नहीं है       

वन्दे मातरम्

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