राष्ट्र चेतना ९
शिक्षा एवं शिक्षण के अरणी मंथन के द्वारा गुरु अपने शिष्य के अंतस रूपी यज्ञ कुंड में ज्ञान यज्ञ हेतु विद्या रूपी ज्ञान अग्नि का प्रज्वलन करता है अग्नि जैसे समस्त अवांछित हानिप्रद तत्वों का निर्मूलन कर बुद्धि विवेक व्यक्ति को परिमार्जित एवं पवित्र कर विद्याध्ययन हेतु उपयुक्त बनाती है वैसे ही दैनंदिन जीवन में भी हम देखते हैं कि दैनिक उपयोग की वस्तुएं खाद्य सामग्री का भी हम प्रक्षालन धावन शोधन कर ही प्रयोग में लाते हैं ज्ञान केवल बोध मात्र तक सीमित नहीं है उसे ज्ञान विज्ञान दर्शन अध्यात्म तक ऊर्ध्व गामी पर पर अग्रसर करना भी गुरु एवं शिष्य दोनों का समान दायित्व है आज कल शिक्षा मात्र बोध ज्ञान उपाधि नौकरी परिवार तक ही सीमित हो कर रह गई है आज जो विसंगतियों का अंबार हमें दिखाई देता है वह स्वाध्याय चिंतन मनन की ओर परांडमुख होने के कारण है हम शिक्षित हो उदर पूर्ति हेतु तो तैयार हो जाते हैं पर क्या हम ऋणों देव ऋण गुरु ऋण पितृ ऋण एवं राष्ट्र ऋण या धर्म ऋण के लिए तैयार हो पाते हैं मनुष्य जन्म एक महद्युद्देष्य हेतु है हमें नर से नारायण स्वार्थ से निस्वार्थ अर्थ से परमार्थ ज्ञान से विज्ञान व्यष्टि से समष्टि जगत से ब्रह्मांड आकार से निराकार आत्मा से परमात्मा बद्ध से मुक्त बंधन से मोक्ष की ओर ऊर्ध्वगामी सांसारिक से अध्यात्मिक हो बोध से चिंतन की यात्रा करनी है आज हम जागतिक बंधनों में बंधना अधिक श्रेयस्कर समझते हैं और अपने जीवन को स्वनामधन्य मान बैठते हैं पर क्या इसी उद्देश्य हेतु हमें यह मनुष्य जन्म प्राप्त हुआ है कदापि नहीं वह शिक्षा वह ज्ञान जो हमें राष्ट्र धर्म संस्कृति संस्कार से दूर करें वैसी शिक्षा ज्ञान व्यर्थ है जिसका राष्ट्र धर्म संस्कृति के अभिवर्धन हेतु उपयोग न हो सके वह भी व्यर्थ है और वह शिक्षा ज्ञान जो राष्ट्र धर्म संस्कृति संस्कार स्वाभिमान आस्था के प्रति कुबुद्धि कुद्रृष्टि कुचिंतन को जन्म दे वह भी व्यर्थ है येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्म में मृत्यु लोके भुवि भार भूत मनुष्य रूपेण मृगश्चरंति ऐसे लोगों की ही आज भरमार समाज में अधिक हो गयी है जो राष्ट्र धर्म संस्कृति संस्कार स्वाभिमान हिंदुत्व से बढ़कर अन्य गौण वस्तुओं तथा स्वार्थ साधन ठकुरसुहाती आदि को महत्व देते हैं यह भौतिक चिंतन का दुष्परिणाम है तात्विक अध्यात्म ही हमें राष्ट्र धर्म संस्कृति के निकट ला पायेगा एवं उसे आत्मोत्कर्ष तात्विक रूप में राष्ट्र को भूकृति मात्र न समझ राष्ट्र देव समझ पायेगा और राष्ट्र धर्म संस्कृति के प्रति एकनिष्ठ आस्था एवं राष्ट्र धर्म का कर्तव्य बोध का भी भान कर पाएगा एवं अधिकार से पहले कर्तव्य को महत्व देगा वंदे मातरम् जय मां भारती जय हिंदुत्व जय हिंदु राष्ट्र भारत 🚩🙏🌈
Comments
Post a Comment