राष्ट्र चेतना ८
भारत का गौरव त्याग है वृत्रासुर को मारने के लिए अस्त्र-शस्त्र निर्माण के लिए ऋषि दधीचि के अस्थि दान से महाराज हरिश्चन्द्र शिबि रन्तिदेव सभी ने दान किया महादानी कर्ण ने युद्ध भूमि में अपने सोने के दांत को बात से गंगा प्रकट कर धो कर दान किया महाराज हर्षवर्धन भी दान के लिए ही प्रतिश्रुत हैं भगवान श्रीराम ने पिता के वचन के अनुपालन में राज्य का दान किया दान एवं त्याग बहुत ऊंचे आदर्श हैं वैदिक याज्ञनिक परंपरा में यज्ञ कुंड में आहुति का मंत्र इदम अमुक देवाय इदन्न मम अर्थात यह आहुति मैं अमुक देवी-देवता को दे रहा हूं यह मेरा नहीं मेरा नहीं इंगित करता है कि मनुष्य का कुछ नहीं वह जब तक नश्वर शरीर के साथ नश्वर संसार में है वह उपलब्ध वस्तुओं का उपयोग उपभोग करता है उपभोक्ता consumer है स्वामी owner नहीं यह हमारे भारतीय दर्शन के उच्चतम स्तर पर ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या के ही अनुरूप है जो हमें निरासक्त जीवन जीने की प्रेरणा देता है दान त्याग हमें निरासक्त बनाते हैं इसीलिए हमारे यहां के सम्राट अपवाद छोड़ कर सभी त्याग और दान की प्रतिमूर्ति राजर्षि रहे यथा विदेह राज जनक आदि यह तो रही महापुरुषों की बात अब सबसे महत्वपूर्ण प्राण सभी को प्रिय होता है परंतु राष्ट्र धर्म संस्कृति की रक्षार्थ हमारे यहां अगणित वीरों वीरांगनाओं हुतात्माओं ने अपने प्राण न्यौछावर कर दिए महाराणा प्रताप छत्रपति शिवाजी शंभू राजे आदि और मातृशक्ति भी बलिदान में अग्रणी रही यथा महारानी दुर्गावती चेनम्मा लक्ष्मीबाई पद्मिनी आदि अनुक्ता ये भक्त्या हरि चरण संसक्त हृदया अविज्ञाता वीरा अधिसमरमुध्वस्त रिपव: महात्मान:सन्तो भरतभुवि च परे नमस्तेभ्योभूयात्दुषसिस्कलेभ्य:प्रतिदिनम यह श्लोक समस्त ज्ञात अज्ञात वीरों साधु संतों को स्मरण करता है दान त्याग बलिदान भी एक तप है बहुत पुण्य के उदय होने पर इसका अवसर प्राप्त होता है आज अभी बलिदान का अवसर तो नहीं आया है पर राष्ट्र धर्म संस्कृति हिंदुत्व सनातन धर्म के लिए सौभाग्य से अवसर आने पड़ा है माता भूमि पुत्रोहम पृथिव्या को स्मरण कर हिंदुत्व शक्ति बन खड़ा होना ही धर्म युग धर्म एवं राष्ट्र धर्म है वंदे मातरम् जय हिंदुत्व जय हिंदु राष्ट्र भारत 🚩 जय हिंदुत्व सनातन धर्म
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