राष्ट्र:एक दर्शन
वह राष्ट्र जो राष्ट्र, धर्म, संस्कृति के प्रति कर्तव्य बोध दायित्व बोध से वंचित हो रोटी कपड़ा और मकान की सोच और उदर पूर्ति तक सीमित रह जाता है उस पर अस्तित्व का संकट आता ही है इतिहास साक्षी है आक्रांताओं एवं विधर्मियों के हौसले बुलंद करने वाले हम में से ही थे हिंदू ही हिंदु का शत्रु रहा है आज भी है ||जय श्री राम||
Comments
Post a Comment