संस्कृत-संस्कार-संस्कृति-सनातन धर्म से पाश्चात्य अंधानुकरण, मानसिक दासता, आधुनिकता और पाश्चात्यीकरण का दुष्परिणाम आज हमारे सामने हैं हम जब नयी पीढ़ी को कूटरचित इतिहास परोसेंगे तब यही होना था हमने कभी भी अपने इतिहास, गौरवशाली अतीत को जानने की जिज्ञासा नहीं दिखाई और औपनिवेशिक एवं दरबारी चाटुकार इतिहासकारों की बातें पत्थर की लकीर मान स्वीकार करते रहे एक नवस्वतंत्र देश का इतिहास गौरवशाली अतीत का शौर्य त्याग एवं बलिदान की यशोगाथा होनी चाहिए थी यहां इसके उलट पराभव, पराभूत भारत का हतोत्साहक,मर्माहत करने वाला इतिहास बना कर पीढ़ियों के साथ विश्वासघात करने दिया गया आज जो परिणाम हमारे सामने हैं वह उसी षड्यंत्रकारी कूटरचित इतिहास का परिणाम है हमें वैदिक सनातन इकोसिस्टम को लाना होगा और इस और आनेवाली पीढ़ियों को उसके अनुरूप ढालना होगा यह अत्यंत आवश्यक है यदि हमें भारत और भविष्य के भारत को साकार करना है जयतु सनातनम् जयतु भारतम् 🚩🙏
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एक विश्लेषण
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भारत राष्ट्र की मौलिक अवधारणा है सांस्कृतिक से संस्कारजन्य से अभिप्राय है संस्कार वैदिक पृथ्वी सूक्त के माता भूमि: पुत्रोहं पृथवया से है जो हमारा मातृभूमि से मत पुत्र का संबंध स्थापित करता है जो एक नैसर्गिक सत्य है मत एवं पुत्र का संबंध पवित्रताम एवं दैवीय है पारंपरिक स्थापना से निष्ठा का जन्म होता है मत पुत्र संबंध के चलते हम मातृभूमि कहते हैं सम्पूर्ण विश्व मे हम ही अकेले मातृभूमि कहते हैं राष्ट्र औरों के लिए एक भूमि का टुकड़ा अथवा एक भौगोलिक पहचान होगी हम हमारे वैदिक ऋषि पूर्वजों के पाठ पर चल भारत को जीवंत राष्ट्र देव मानते आए हैं यह एक स्थापित सत्य है अतः निष्ठा एक मौलिक आधार है जो हमे राष्ट्र भाव से ओतप्रोत करता है भारत के वैदिक मूल की सजीवनी हमारे ऋषि पूर्वजों द्वारा प्रदत्त सत्य सनातन वैदिक धर्म है सर्वं खलविदं ब्रह्म के ओजस्वी विचारधारा से विश्व को ब्रह्म का रूप जान नदियों,पर्वतों,वनस्पतियों,प्रकृति की हम पूजा करते हैं एकां सद विप्र बहुधा वदंति के अनुसार हम सर्व धर्म समभाव मे विश्वास रखते हैं एक परमेश्वर को विभिन्न दृष्टिक...
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