जिन्हें भारत को मातृभूमि कहने में संकोच इन्कार है अर्थात वंदे मातरम् कहने में संकोच है उन्हें राष्ट्र में रहने का अधिकार नहीं भारत में रहना,सारी सुविधाओं का लाभ लेना और भारत के विरुद्ध विषबाण, विषाक्त षड्यंत्र रचने वाली शक्तियों के साथ भारत तेरे टुकड़े होंगे के कुत्सित मनोवृत्ति को कार्यान्वित करने वाले लोगों, राजनीतिक पेशेवर कुनबों जो जातिवाद, सांप्रदायिकता, राजनीतिक महत्वाकांक्षा को साधने के लिए वोट बैंक से सत्ता पाने की जुगाड़ में लगे लोगों, विचारधारा और गतिविधियों के साथ गलबहियां डाले उनके स्वर में एकलय हो रहे हैं वे स्पष्ट समझ लें उनका यह पारंपरिक स्वछंद स्वेच्छाचारी कलाबाजियां अब असह्य है और अनुशासनहीनता का अपराधानुरूप कठोरतम दंड मिल कर ही रहेगा शठं शाठ्यं समाचरेत पय: पानं भुजंगानाम केवलं विष वर्धनम हम अनुभव से भली भांति समझ चुके हैं वंदे मातरम् 🚩🙏
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एक विश्लेषण
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भारत राष्ट्र की मौलिक अवधारणा है सांस्कृतिक से संस्कारजन्य से अभिप्राय है संस्कार वैदिक पृथ्वी सूक्त के माता भूमि: पुत्रोहं पृथवया से है जो हमारा मातृभूमि से मत पुत्र का संबंध स्थापित करता है जो एक नैसर्गिक सत्य है मत एवं पुत्र का संबंध पवित्रताम एवं दैवीय है पारंपरिक स्थापना से निष्ठा का जन्म होता है मत पुत्र संबंध के चलते हम मातृभूमि कहते हैं सम्पूर्ण विश्व मे हम ही अकेले मातृभूमि कहते हैं राष्ट्र औरों के लिए एक भूमि का टुकड़ा अथवा एक भौगोलिक पहचान होगी हम हमारे वैदिक ऋषि पूर्वजों के पाठ पर चल भारत को जीवंत राष्ट्र देव मानते आए हैं यह एक स्थापित सत्य है अतः निष्ठा एक मौलिक आधार है जो हमे राष्ट्र भाव से ओतप्रोत करता है भारत के वैदिक मूल की सजीवनी हमारे ऋषि पूर्वजों द्वारा प्रदत्त सत्य सनातन वैदिक धर्म है सर्वं खलविदं ब्रह्म के ओजस्वी विचारधारा से विश्व को ब्रह्म का रूप जान नदियों,पर्वतों,वनस्पतियों,प्रकृति की हम पूजा करते हैं एकां सद विप्र बहुधा वदंति के अनुसार हम सर्व धर्म समभाव मे विश्वास रखते हैं एक परमेश्वर को विभिन्न दृष्टिक...
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