धर्म शक्ति ही राष्ट्र शक्ति है धर्मो रक्षति रक्षित: से हेतु राष्ट्र धर्म ही है धर्म का संगठित मूर्त रूप राष्ट्र है संगछध्वं संवद्ध्वं सं वो मनांसि जानताम् से हम सभी एक हो राष्ट्र को स्वरूप देने में समर्थ होते हैं राष्ट्र के प्रति कर्तव्य बोध दायित्व बोध से स्वप्रेरित हो हम राष्ट्र का भाव चित्र राष्ट्र के रूप में साकार करते हैं भारत एक सनातन वैदिक राष्ट्र है राष्ट्र अंतर्हित भावना का साकार निरूपण है राष्ट्र मूर्ति के मौलिक स्वरूप मौलिक आकार को अक्षुण्ण बनाए रखने का दायित्व कर्तव्य है और यह राष्ट्र धर्म सर्वोपरि हो सबके लिए है और राष्ट्रीय होने के नाते सभी का राष्ट्र के प्रति त्याग समर्पण बलिदान राष्ट्र भक्ति राष्ट्र निष्ठा एक अनिवार्य बाध्यता है अन्यथा हमें अपने को राष्ट्रीय कहने का कोई अधिकार नहीं कर्तव्य नहीं तो अधिकार कदापि नहीं हमसे सबसे बड़ी भूल धर्म से विमुख होना रहा और राष्ट्र दुर्गति के श्याम विवर में धकेला जाता रहा धर्म कर्तव्य बोध दायित्व बोध कराता है हमने अधिकार की शिक्षा कुछ अधिक ले ली यह हमारा दुर्भाग्य रहा तभी आज कर्तव्य विमुख हो हम अधिकार की बात करते हैं आज चहुं ओर असंतोष का कारण आज आवश्यकता है हम राष्ट्र धर्म हेतु सभी को कर्तव्य बोध दायित्व बोध प्रति बोध जागृत करने की प्रेरणा दें राष्ट्र धर्म की सार्थकता तभी संभव है अन्यथा वह वाग्विलास बन कर रह जाएगी मूर्त रूप लेने में सर्वथा असमर्थ रहेगी ||नमो मातृभूमि अखंड भारत||🕉️🚩🙏
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एक विश्लेषण
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भारत राष्ट्र की मौलिक अवधारणा है सांस्कृतिक से संस्कारजन्य से अभिप्राय है संस्कार वैदिक पृथ्वी सूक्त के माता भूमि: पुत्रोहं पृथवया से है जो हमारा मातृभूमि से मत पुत्र का संबंध स्थापित करता है जो एक नैसर्गिक सत्य है मत एवं पुत्र का संबंध पवित्रताम एवं दैवीय है पारंपरिक स्थापना से निष्ठा का जन्म होता है मत पुत्र संबंध के चलते हम मातृभूमि कहते हैं सम्पूर्ण विश्व मे हम ही अकेले मातृभूमि कहते हैं राष्ट्र औरों के लिए एक भूमि का टुकड़ा अथवा एक भौगोलिक पहचान होगी हम हमारे वैदिक ऋषि पूर्वजों के पाठ पर चल भारत को जीवंत राष्ट्र देव मानते आए हैं यह एक स्थापित सत्य है अतः निष्ठा एक मौलिक आधार है जो हमे राष्ट्र भाव से ओतप्रोत करता है भारत के वैदिक मूल की सजीवनी हमारे ऋषि पूर्वजों द्वारा प्रदत्त सत्य सनातन वैदिक धर्म है सर्वं खलविदं ब्रह्म के ओजस्वी विचारधारा से विश्व को ब्रह्म का रूप जान नदियों,पर्वतों,वनस्पतियों,प्रकृति की हम पूजा करते हैं एकां सद विप्र बहुधा वदंति के अनुसार हम सर्व धर्म समभाव मे विश्वास रखते हैं एक परमेश्वर को विभिन्न दृष्टिक...
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