राष्ट्र धर्म बोध: कर्तव्य बोध दायित्व बोध
धर्म की ग्लानि जो भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित किया है वह क्या था आज के संदर्भ में समझने की महती आवश्यकता है जब राष्ट्र, धर्म, संस्कृति के ऊपर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष आक्रमण होते हैं तब राष्ट्र धर्म, क्षात्र धर्म, युग धर्म का बोध, दायित्व बोध, कर्तव्य बोध कराने के लिए अर्जुन विषाद क्या था अपनों के लिए मोह से उत्पन्न धर्मयुद्ध से विरत होना तब श्री भगवान कहते हैं क्लैव्यं मा स्म गम: पार्थ नैतत्त्वययुपपद्यते क्षुद्रं हृदय दौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिषठ परंतप आगे श्री भगवान कहते हैं हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम तस्माद्युतिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृत निश्चय: इससे सुस्पष्ट है कि राष्ट्र, धर्म, संस्कृति पर होने वाले आक्रमणों के विरुद्ध एकजुट होकर राष्ट्र धर्म निभाने की हमारी कार्य संस्कृति रही है जो आज जातिवाद में बंटे हम भूल चुके हैं हर राष्ट्र निष्ठ हिंदुत्व धारी सनातनी का यह कर्तव्य है दायित्व है कि वह सनातन एकता का महत्व, शक्ति एवं क्षमता का बोध कराए हमें धर्म योद्धा एवं प्रचारक शस्त्र एवं शास्त्र से ही करनी होगी जैसे हमारे पूर्वजों ने परंपरा निभाई एवं मातृभूमि के स्वाभिमान रक्षा करते वीर गति पायी वयं राष्ट्रे जागृयाम् पुरोहिता: न हिंदव:पतितो भवेत् मम दीक्षा हिंदु रक्षा मम संकल्प सनातन एकता समरसता जय मां भारती वंदे मातरम् जय हिंदुत्व जयतु सनातनम् जयतु हिंदु राष्ट्रं भारतम् 🚩🙏
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